शिक्षण की वैज्ञानिक विधि

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शिक्षण की वैज्ञानिक विधि
शिक्षण की वैज्ञानिक विधि

शिक्षण की वैज्ञानिक विधि:– इस आर्टिकल में आज SSCGK आपको शिक्षण की वैज्ञानिक विधि के बारे में विस्तार से समझाएंगे। इस से पहले में आप आरटीई एक्ट 2009 की अपेक्षाएं के बारे में विस्तार से पढ़ चुके हैं।

शिक्षण की वैज्ञानिक विधि:-

लुंडबर्ग के अनुसार, “शिक्षण की वैज्ञानिक विधि व्यवस्थित अवलोकन, वर्गीकरण व आंकड़ों की व्याख्या से बनी है।”

कार्ल पीयरसन के अनुसार शिक्षण की इस विधि की निम्नलिखित विशेषताएं हैं:-

1.तथ्यों का सावधानीपूर्वक व सही वर्गीकरण।

2.उनके क्रम व सह संबंधों का अवलोकन और सृजनात्मक सोच व आत्म आलोचना की सहायता से वैज्ञानिक नियमों की खोज।

3.वैज्ञानिक विधि में चिंतनशील सोच, तर्क और कुछ क्षमता कौशलों एवं अभिवृत्तियों को प्राप्त करने के नतीजे शामिल हैं।

4.वैज्ञानिक विधि में निरंतर प्रशिक्षण की आवश्यकता है।

5.शिक्षण की इस  विधि के अनुसार लगातार मूल्यांकन के लिए अनुकूल परिस्थितियां व क्रियाकलाप शिक्षार्थियों के सामने चाहिए।

सही मायने में वैज्ञानिक विधि समस्या समाधान विधि है। यह विधि उन महत्वपूर्ण विधियों में से एक है, जिनमें शिक्षक एवं छात्र समस्या के प्रति आकर्षित होकर सुव्यवस्थित तथा क्रमबद्ध ढंग से इसका समाधान निकालने में तत्परता से जुट जाते हैं। शिक्षण की इस  विधि के अंतर्गत ज्ञान प्राप्ति की अपेक्षा इसमें अभ्यास को अधिक महत्व दिया जाता है।

इस वैज्ञानिक विधि के अंतर्गत एक बार छात्रों को अध्ययन तथा अभ्यास करा देने के पश्चात् उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे अन्य समस्याओं के समाधान में भी वैज्ञानिक पदों का प्रयोग करेंगे। चाहे वह नवीन समस्या उनके लिए अपरिचित ही क्यों न हो। आधुनिक विज्ञान का  प्रत्यक्ष ज्ञान सभी व्यक्तियों को उनकी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा हो सकता है।

शिक्षण की वैज्ञानिक विधि:-

शिक्षण की वैज्ञानिक विधि की विशेषताएं- वैज्ञानिक विधि की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-

1.- शिक्षण की यह  विधि छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करने हेतु उचित वातावरण सृजित करती है।

2.- शिक्षण की इस  विधि छात्रों की मानसिक शक्ति का विकास करती है।

3.- शिक्षण की यह  विधि विद्यार्थी को ज्ञानवान, जागृत एवं नवीन सूचनाओं हेतु सक्षम बनाती है, ताकि वह ठोस निर्णय लेकर किसी सिद्धांत अथवा नियम के बारे में गहनता तथा सत्यता का परीक्षण कर सकें।

4.-इस विधि से विद्यार्थी में खोजने की तीव्र इच्छा होती है। उसकी जिज्ञासा को जगाकर साहसपूर्ण कार्य की भावना का विकास करती है।

5.-इस विधि से  बालक में आविष्कार शक्ति, सशक्त कल्पना-शक्ति एवं निर्माण-शक्ति का विकास होता है।

6.-इस विधि से बालक अप्रमाणित तथ्यों को छोड़कर प्रमाणित तथ्यों को स्वीकार करता है। फलस्वरूप सही सिद्धांत पनपते हैं।

7.-शिक्षण की इस  विधि  से छात्रों के विचारों में स्वतंत्रता एवं आलोचनात्मक दृष्टिकोण का प्रादुर्भाव होता है।

Shikshan ki Vaigyanik Vidhi:-

शिक्षण की वैज्ञानिक विधि के प्रमुख चरण:-

नं.1. समस्या को महसूस करना

नं.2. समस्या को परिभाषित करना

नं.3. समस्या का विश्लेषण

नं.4. आंकड़े एकत्रित करना

नं.5. आंकड़ों का अर्थ निकालना

नं.6. परिकल्पना का विकास एवं चयन

नं.7. निष्कर्ष निकालना और सामान्यीकरण करना

शिक्षण की मनोवैज्ञानिक विधि:-

नं.1. समस्या को महसूस करना-शिक्षक को चाहिए कि वे विद्यार्थियों के सामने कुछ ऐसी परिस्थितियां प्रस्तुत करें, ताकि वे प्रश्न पूछने की आवश्यकता महसूस करें। विद्यार्थियों से ऐसे प्रश्न पूछे कि वह उनके लिए शोध एवं तर्क के आधार पर हल होने वाली समस्या बन जाए।

नं.2. समस्या को परिभाषित करना-शिक्षक को समस्या परिभाषित करने में विद्यार्थी की सहायता करनी चाहिए। वह उन्हें कहे कि वे अपने अवलोकन के आधार पर समस्या को परिभाषित करें और चर्चा के लिए कक्षा में प्रस्तुत करें। विद्यार्थी निम्न प्रकार से अपनी समस्या की कथन लिख सकते हैं-

१.पानी क्यों उबल रहा है?

२.पहले पानी क्यों उबला?

नं.3. समस्या का विश्लेषण- शिक्षार्थी अब कुछ नए शब्द ढूंढते हैं, जो समस्या का अध्ययन करने के लिए महत्वपूर्ण सुराग प्रस्तुत करते हैं।

नं.4. आंकड़े एकत्रित करना-आंकड़ों का संग्रह या एकत्रित करण वह प्रक्रिया है, जिसमें एक व्यवस्थित तरीके से समस्या से संबंधित हल के विषय में सूचनाएं एकत्रित की जाती हैं।

नं.5. आंकड़ों का अर्थ निकालना-यह एक महत्वपूर्ण और कठिन चरण है, क्योंकि इसमें चिंतनशील सोच की आवश्यकता होती है।

शिक्षण की मनोवैज्ञानिक विधि:-

नं.6. परिकल्पना का विकास एवं चयन-परिकल्पना किसी समस्या का संभव समाधान या शिष्ट अनुमान होती हैं। शिक्षक अपने कौशल के आधार पर सबसे उपयुक्त एवं सबसे उत्तम परिकल्पना का चयन करता है।

नं.7. निष्कर्ष निकालना और सामान्यीकरण करना-वास्तव में स्वीकृत परिकल्पना ही निष्कर्ष है। फिर भी निष्कर्ष निकालने के लिए एक साथ कई प्रयोग किए जाते हैं। शिक्षार्थियों का भी यह कर्तव्य बनता है कि वे सामान्यीकरण का उपयोग अपने दैनिक जीवन में करें। इससे कक्षा की परिस्थितियों व जीवन की परिस्थितियों में दूरी कम होगी।